Saturday, January 29, 2022
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भगवान शिव की आराधना के लिए ये हैं मंत्र, जप करने से दूर होंगे संकट, मिलेगी धन-संपदा

भगवान शिव के मंत्र: भगवान शिव की पूजा करते समय किन मंत्रों, स्त्रोतों का पाठ करना चाहिए, आइये यहां जानते हैं। इन मंत्रों, स्त्रोतों का पाठ पूरी श्रद्धा-भक्ति, सरलता और सहजता से करने से भगवान शिव की कृपा प्राप्त होती है। मनुष्य के कष्ट, संकट दूर होते हैं। भगवान शिव की कृपा से धन संपदा, सुख-संपत्ति, ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है।

भगवान शिव के मंत्र

ऊं नमः शिवाय।।

कर्पूरगौरं करुणावतारं संसारसारं भुजगेन्द्रहारम्।

सदा बसन्तं हृदयारबिन्दे भबं भवानीसहितं नमामि।।[

महामृत्युंजय मंत्र

महामृत्युंजय ऋग्वेद का प्रसिद्ध और सिद्ध मंत्र है। सहज मंत्र ओम है तो सारी बाधाओं से मुक्ति का महामंत्र महामृत्युंजय मंत्र है। यह मृत संजीवनी है। मार्कण्डेय ऋषि को इसी मंत्र ने अल्पायु से जीवन संजीवनी दी थी। यमराज भी उनके द्वार से वापस चले गए थे। इस मंत्र का जाप करते समय पूरी सावधानी रखनी चाहिए।

त्रयम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्। उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्॥

इन मंत्रों का भी जाप करें (भगवान शिव के मंत्र) –

नागेंद्रहाराय त्रिलोचनाय भस्मांग रागाय महेश्वरायनित्याय शुद्धाय दिगंबराय तस्मे न काराय नम: शिवाय:॥

मंदाकिनी सलिल चंदन चर्चिताय नंदीश्वर प्रमथनाथ महेश्वरायमंदारपुष्प बहुपुष्प सुपूजिताय तस्मे म काराय नम: शिवाय:॥

शिवाय गौरी वदनाब्जवृंद सूर्याय दक्षाध्वरनाशकायश्री नीलकंठाय वृषभद्धजाय तस्मै शि काराय नम: शिवाय:॥

अवन्तिकायां विहितावतारं मुक्तिप्रदानाय च सज्जनानाम्।अकालमृत्यो: परिरक्षणार्थं वन्दे महाकालमहासुरेशम्।।

|| बिल्वाष्टकम ||

त्रिदलं त्रिगुणाकारं त्रिनेत्रं च त्रियायुधम् त्रिजन्मपाप संहारं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥

त्रिशाखैः बिल्वपत्रैश्र्च अच्छिद्रै: कोमलैः शुभैः शिवपूजां करिष्यामि एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥

अखण्ड बिल्व पात्रेण पूजिते नन्दिकेश्र्वरे शुद्ध्यन्ति सर्वपापेभ्यो एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥

शालिग्राम शिलामेकां विप्राणां जातु चार्पयेत् सोमयज्ञ महापुण्यं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥

दन्तिकोटि सहस्राणि वाजपेय शतानि च कोटि कन्या महादानं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥

लक्ष्म्या स्तनुत उत्पन्नं महादेवस्य च प्रियम् बिल्ववृक्षं प्रयच्छामि एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥

दर्शनं बिल्ववृक्षस्य स्पर्शनं पापनाशनम् अघोरपापसंहारं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥

काशीक्षेत्र निवासं च कालभैरव दर्शनम् प्रयागमाधवं दृष्ट्वा एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥

मूलतो ब्रह्मरूपाय मध्यतो विष्णुरूपिणे अग्रतः शिवरूपाय एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥

बिल्वाष्टकमिदं पुण्यं यः पठेत् शिवसन्निधौ सर्वपाप विनिर्मुक्तः शिवलोकमवाप्नुयात् ॥

इति श्री बिल्वाष्टकम संपूर्णम्

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॥ रुद्राष्टकम् ॥

श्री रुद्राष्टकम्  स्तोत्र गोस्वामी तुलसीदास द्वारा भगवान् शिव की स्तुति हेतु रचित है। इसका उल्लेख श्री रामचरितमानस के उत्तर कांड में आता है। इसके पाठ से मानसिक शांति और शिवजी की कृपा प्राप्त होती है।

नमामीशमीशान निर्वाणरूपम्। विभुम् व्यापकम् ब्रह्मवेदस्वरूपम्।

निजम् निर्गुणम् निर्विकल्पम् निरीहम्। चिदाकाशमाकाशवासम् भजेऽहम् ॥१॥

निराकारमोंकारमूलम् तुरीयम्। गिराज्ञानगोतीतमीशम् गिरीशम्।

करालम् महाकालकालम् कृपालम्। गुणागारसंसारपारम् नतोऽहम् ॥२॥

तुषाराद्रिसंकाशगौरम् गभीरम्। मनोभूतकोटि प्रभाश्रीशरीरम्।

स्फुरन्मौलि कल्लोलिनी चारुगंगा। लसद्भालबालेन्दु कण्ठे भुजंगा ॥३॥

चलत्कुण्डलम् भ्रूसुनेत्रम् विशालम्। प्रसन्नाननम् नीलकण्ठम् दयालम्।

मृगाधीश चर्माम्बरम् मुण्डमालम्। प्रियम् शंकरम् सर्वनाथम् भजामि ॥४॥

प्रचण्डम् प्रकृष्टम् प्रगल्भम् परेशम्। अखण्डम् अजम् भानुकोटिप्रकाशम्।

त्रयः शूलनिर्मूलनम् शूलपाणिम्। भजेऽहम् भवानीपतिम् भावगम्यम् ॥५॥

कलातीत कल्याण कल्पान्तकारी। सदा सज्जनानन्ददाता पुरारि।

चिदानन्द सन्दोह मोहापहारि। प्रसीद प्रसीद प्रभो मन्मथारि ॥६॥

न यावद् उमानाथपादारविन्दम्। भजन्तीह लोके परे वा नराणाम्।

न तावत्सुखम् शान्ति सन्तापनाशम्। प्रसीद प्रभो सर्वभूताधिवासम् ॥७॥

न जानामि योगम् जपम् नैव पूजाम्। नतोऽहम् सदा सर्वदा शम्भु तुभ्यम्।

जराजन्मदुःखौघ तातप्यमानम्। प्रभो पाहि आपन्नमामीश शम्भो ॥८॥

रुद्राष्टकमिदम् प्रोक्तम् विप्रेण हरतोषये। ये पठन्ति नरा भक्त्या तेषाम् शम्भुः प्रसीदति॥

॥ इति श्री रुद्राष्टकम् सम्पूर्णम् ॥

 

 || द्वादश ज्योतिर्लिंग स्तुति ||

सौराष्ट्रे सोमनाथम् च श्रीशैले मल्लिकार्जुनम्‌।

उज्जयिन्यां महाकालम् ॐकारम् ममलेश्वरम्‌ ॥1॥

पर्ल्यां वैद्यनाधञ्च डाकिन्याम् भीमशङ्करम् ।

सेतुबन्धे तु रामेशम् नागेशम् दारुकावने ॥2॥

वारणस्याम् तु विश्वेशं त्र्यम्बकं गौतमी-तटे।

हिमालये तु केदारं घृष्णेशम् च शिवालये ॥3॥

एतानि ज्योतिर्लिंगानि सायं प्रातः पठेन्नरः।

सप्तजन्मकृतं पापं स्मरणेन विनश्यति ॥4॥

॥ इति द्वादश ज्योतिर्लिंग स्तुति संपूर्णम्‌ ॥

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