Saturday, January 29, 2022
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नवग्रह : कुंडली में ग्रहों की स्थिति से जातकों के जीवन पर पड़ता है बड़ा प्रभाव, जानिए नवग्रह और उनके मंत्र क्या हैं

नवग्रह कौन-कौन से हैं: प्राचीन काल से ही जातक भाग्य और भविष्य के प्रति जिज्ञासु रहा है। जातक की पहली और आखिरी इच्छा अपने भविष्य को जानने की होती है। इसी जिज्ञासा के कारण ज्योतिषशास्त्र की उत्पत्ति हुई। ज्योतिष वह शास्त्र है जिसमें “ज्योति” यानी प्रकाश जिससे जीवन का महत्व झलकता है, नयन प्रकाश में ही देखने योग्य होती हैं। इसलिए यह स्पष्ट है कि ज्योतिष वह शास्त्र है जिसमें शरीर स्थित सौर मंडल का बाहरी फलाफल निर्देशित करना है जिसे “ज्योतिष सूर्यादि ग्रहाणां बोधकं शास्त्रं” से स्पष्ट किया गया है।   यहां हम सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि आदि मूल ग्रह और राहु-केतु (छाया ग्रह) की चाल का जातक के जीवन पर क्या शुभ-अशुभ प्रभाव पड़ता है को जानेंगे।

सूर्य

सूर्य को सभी ग्रहों का राजा माना गया है। इसी से सभी प्रकाशित होते हैं। अग्नि तत्व होने से शक्ति प्राप्त होती है। सूर्य को ज्योतिष शास्त्र में आत्मा का दर्जा प्राप्त है। सूर्य के द्वारा शासन, धैर्य, मान-सम्मान, ऐश्वर्य, ज्ञान, विवेक, सद्गुण, आरोग्य, धन प्राप्त होते हैं। इसके अलावा सूर्य से ही सत्य, काम, अभिलाषा, इच्छा की पूर्ति होती है। सूर्य जातक को महामानव बनाता है। सूर्य के विपरीत प्रभाव से जातक के जीवन में कष्ट, अनिश्चितता, बल की कमी, रोग आदि से पीड़ित होता है।

बीज मंत्र– ॐ ह्रां ह्रीं ह्रौं सः सूर्याय नमः।

विधि– इस मंत्र का रविवार को प्रात:काल नित्यकर्म से निवृत्त होने के बाद 108 बार जाप करें।

चंद्र

ज्योतिष शास्त्र में चंद्र को रानी का दर्जा प्राप्त है। चंद्र मन का स्वामी ग्रह है। मन का संचालन चंद्र के द्वारा ही किया जाता है। जिस जातक का मन पर नियंत्रण होता है वह उत्तम चरित्र वाला होता है। ऎसे जातक को मान-सम्मान, धन-संपत्ति की कमी नहीं होती है। स्त्री जाति के पूरे शरीर का स्वामी चंद्र होता है। चंद्र जातक को दयालु बनाता है। यदि चंद्र निर्बल हो तो जातक में ज्ञान की कमी, कमजोर चरित्र, रोगों की अधिकता होती है।

बीज मंत्र- ॐ श्रां श्रीं श्रौं सः चंद्रमसे नमः।

विधि- मंत्र का सोमवार को संध्याकाल में 108 बार जाप करें।

मंगल

ज्योतिष शास्त्र में मंगल को सेनापति का दर्जा प्राप्त है। मंगल से जातक को शक्ति मिलती है। मंगल के विषय प्रायः अशुभ चर्चा की ही की जाती है। लेकिन मंगल जातक को अच्छा और खराब दोनों ही बनाता है। इसे भूमिपुत्र भी कहा गया है। जिस जातक का मंगल बेहद मजबूत होता है वह जातक अपार शक्तिशाली, जोखिम से नहीं घबराने वाला होता है। साहस से भरपूर होता है। कमजोर मंगल जातक के जीवन कई प्रकार की परेशानी लाता है, जिसमें कमजोर आत्मविश्वास, साहस की कमी, भय आदि परिलक्षित होते हैं।

बीज मंत्र- ॐ क्रां क्रीं क्रौं सः भौमाय नमः।

विधि- इस मंत्र का मंगलवार को प्रातःकाल 108 बार जाप करें।

बुध

ज्योतिष शास्त्र में बुध को राजकुमार का दर्जा प्राप्त है। जातक को बुद्धि बल बुध ग्रह के माध्यम से ही मिलती है। बुद्धिमान की समाज में सर्वत्र सराहना होती है। यदि कोई जातक बेहद बुद्धिमान है तो इसका अर्थ यह है कि उसका बुध बेहद मजबूत है। बुध ग्रह यदि अकेला होता है तो वह अपने अनुसार अच्छे और बुरे भाव प्रकट करेगा। लेकिन किसी ग्रह के साथ है तो वह उस ग्रह की प्रवृत्ति के अनुसार अच्छे और बुरे भाव प्रकट करेगा। बुध जब कमजोर हो तो वाणी दूषित होती है। जातक कमजोर बुद्धि वाला होता है।

बीज मंत्र- ॐ ब्रां ब्रीं ब्रौं सः बुधाय नमः।

विधि- मंत्र का बुधवार को 108 बार जाप करें।

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बृहस्पति

यह गुरु है, इसलिए इसे महान माना गया है। बृहस्पति को ज्ञान, बुद्धि, न्याय, चरित्र, धन-संपत्ति का सूचक माना गया है। जीवन में गुरु का बेहद महत्व है। गुरु से से ही जातक को मान-सम्मान, लंबी आयु की प्राप्ति होती है। दया, दान जैसे गुण पनपते हैं। गुरु यदि निर्बल हो तो जातक में अहंकार की प्रवृत्ति होती है। कमजोर चरित्र परिलक्षित होता है।

बीज मंत्र- ॐ ग्रां ग्रीं ग्रौं सः गुरुवे नमः।

विधि- इस मंत्र का नित्य संध्याकाल में 108 बार जाप करें।

शुक्र

यह ग्रह अन्य ग्रहों से अधिक प्रकाशवान होता है। शुक्र से ही जातक संगीत, कला, सौंदर्य, साहित्य, प्रेम, वाक आदि का सूचक है। शुक्र से वीर्यबल का ज्ञान होता है। ज्योतिष शास्त्र में शुक्र को मंत्री का दर्जा प्राप्त है। चरित्र का निर्माण शुक्र से होता है। लज्जा, विनम्रता आदि गुण शुक्र से प्राप्त होते हैं। शुक्र ग्रह यदि अकेला हो तो अपने अनुसार फल प्रदान करता है, यदि वह किसी दूसरे ग्रह के साथ हो तो वह उक्त ग्रह की प्रवृत्ति के आधार पर फल प्रदान करता है। शुक्र के निर्बल होने से जातक रोगी, कमजोर चरित्र वाला होता है।

बीज मंत्र– ॐ द्रां द्रीं द्रौं सः शुक्राय नमः।

विधि- शुक्रवार को दैनिक कर्म से निवृत्त होने के बाद इस मंत्र को 108 बार जाप करें।

शनि

ज्योतिष शास्त्र में शनि को न्यायाधीश की पदवी प्राप्त है। शनि के प्रभाव से व्यक्ति एकांतप्रिय, न्यायवादी, कर्मठ, अपनी बातों पर अडिग रहने वाला और बेहद साहसी होता है। वैज्ञानिक, जज, योगी, संन्यासी, तांत्रिक आदि में शनि का प्रभाव अधिक होता है। शनि के साथ ढैया और साढ़े साती आदि भी जुड़ी हुई है। जिसका प्रभाव प्रत्येक जातक के जीवन में पड़ता है।

बीज मंत्र- ॐ प्रां प्रीं प्रौं सः शनैश्चराय नमः।

विधि- शनिवार के दिन संध्याकाल इस मंत्र का 108 बार जाप करें।

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राहु और केतु

इन दोनों को छाया ग्रह माना जाता है। जातक के जीवन में इनका भी बड़ा महत्व है। राहु को दयावान ग्रह माना जाता है। इसके प्रभाव से व्यक्ति तीर्थयात्रा आदि करता है। जब राहु या केतु के बीच चंद्रकांति वृत्त आ जाता है तब उसका प्रभाव शून्य या अल्प हो जाता है। इसी दौरान ग्रहण संभव होता है। इन ग्रहों की स्थिति कमजोर हो तो जातक का जीवन बदतर हो जाता है। जातक में कलह आदि की प्रवृत्ति ज्यादा होती है।

राहु बीज मंत्र- ॐ भ्रां भ्रीं भ्रौं सः राहवे नमः।

विधि- इस मंत्र का रात के समय 108 बार जाप करें।

केतु बीज मंत्र- ॐ स्रां स्रीं स्रौं सः केतवे नमः।

विधि- मंत्र का रात्रि के समय 108 बार जाप करें।

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